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शादी का मतलब क्या होता है जीवन-भर का साथ, या बंधन

जानिए जीवन के खास पड़वा...  

सत्य संग्राम। भारतीय समाज में नारी को आधुनिक दौर में भी कई अनावश्यक परीक्षाओं से गुजरना पड़ता है, जो किसी भी सभ्य समाज के लिए कलंक के समान है। बेटी के जन्म से लेकर शादी तक आज का समाज नारी को मानव जीवन की मुख्यधारा से अलग करता आया है। जिसके नतीजो से कहीं न कहीं दुष्परिणाम समाने आ रहे है। परंपराओं और संस्कृति वाले हमारे देश में सबसे बड़ा संस्कार विवाह संस्कार है। जिसके जरिए इंसान गृहस्थ आश्रम में प्रवेश करता है और अपनी संतान को जन्म देकर अपनी जिम्मेदारी पूरी करता है। वैदिक रीति-रिवाज को मानने वाले लोग अक्सर कहते हैं कि कोई भी शादी तब तक पूरी नहीं होती जब तक कि सात फेरे ना लिये जायें। लेकिन क्या कभी आपने सोचा है सिर्फ सात फेरे लेने से शादी का रिश्ता जिन्दा रखा जा सकता है, बिल्कुल नहीं, समाज में नारी पर कई तरह से लांछन लगाने वालों की कमी नहीं है, एक शादी जैसे पवित्र रिश्ते को भी कुटील सोच रखने वाला समाज रिश्ते में खटास डाल ही देता है। सवाल यह कि पुरूष चाहे कैसा भी हो लेकिन समाज हमेसा अंगुली नारी पर ही उठाता है। शादी जीवन-भर का साथ है, इसमें को शिक़ायत नहीं, ऐसे वाक्य आपको कहीं भी सुनने को नहीं मिलता है। क्योंकि नारी से ही सारी उम्मीदे होती है, वह चरित्रवान, समझदार, संस्कारी, जिम्मेदार हो जो हर नारी के लिए ऐसा होना किसी सजा से कम नहीं है। बल्कि पुरूष चाहे इन गुणों का नहीं हो। फिर भी समाज उसे स्वीकार करता है। नारी चाहे सर्वगुण सम्पन्न ही क्यों ना हो, अगर वह सुन्दर नहीं है तो भी वह पुरूष समाज उसे पड़ताडित करने से नहीं चुकता है।

विवाह का जिक्र करना भी जरूरी है क्योंकि नारी के जीवन की असली बात तो यहीं से शुरू होती है। कहते विवाह संस्कार दो परिवारों को जोड़ता है। दो लोग सारी ज़िंदगी साथ रहने की क़सम खाते हैं और यह जन्म-जन्म का बंधन है। इस तरह की और भी कई बातें हमारे देश में शादी के बारे में कही जाती हैं। लेकिन कुछ लोग चाहे पति हो या पत्नी अपने रिश्ते को लेकर कुछ नाख़ुश से हो जाते हैं। आखिर यह जन्म-जन्म का साथ क्यों किसी तखलीफ भरे पड़ाव में फंसने लग जाता है देशभर में पति-पत्नी के बीच हुए झगड़े और तलाक के आंकड़े डरावने लगते है, यह कैसे हो जाता है पहले पवित्र बंधन में होते है फिर वह एक-दुसरे की जिन्दगी से तंग आ जाते है। यह सोचनीय विषय है। इस विषय पर देखा जाए समाज में फैला नकारात्मक महौल एक अच्छे रिश्ते को बिगाड़ने के लिए काफी है। समस्याएं सबकी अलग-अलग होंगी, लेकिन वो चंद बातें जो हर रिश्ते के आधार में होती हैं, उनका केवल हम इन शिकायत करने वालों के लिए ज़िक्र करेंगे। विडम्बना यह कि पति-पत्नी जीवन के मुख्य उद्देश्य और जिम्मेदारी को भूलकर लोगों की नकारात्मक बातों को दिल से लगाकर अपने पवित्र बंधन पर सवाल उठाने लगते है, जो किसी भी मजबूत रिश्तें की जड़े को खोखली करने के लिए पर्याप्त है।

शादी के रिश्ते में इन बातों पर ध्यान दिया जाए तो परिणाम आपके पक्ष में आने वाले है- बात यह है कि जो सलीके और समझौते अविवाहित होने पर अपने दोस्तों या अन्य रिश्तों के मामले में हमें याद रहते हैं, शादी के बाद वही हम अपने सबसे ख़ास रिश्ते के लिए भूल जाते हैं। जब बहन, भाई, भाभी, पिता, मां, दोस्त कोई काम करने से मना कर देते हैं, तो बुरा नहीं लगता, लेकिन वही इंकार जीवनसाथी की तरफ़ से आए, तो बहुत बड़ा मुद्दा क्यों बन जाता है। कोई और कैसा दिख रहा है, पार्टी के लिए क्या पहन रहा है, इस मामले में हम अपनी मर्ज़ी अमूमन नहीं थोपते, फिर शादी के बाद जीवनसाथी को क्यों मजबूर करते हैं। घर में मां, भाभी, बहन, भाई, पिता की मदद करने वाले इंसान, पति की भूमिका में आते ही एकाएक हाथ-पांव समेट कर बैठ जाते हैं। अपने आपको व्यस्त और मस्त रखने वाली स्त्री शादी होते ही अपनी हर ख़ुशी, हर काम के लिए पति की राह तकने लगती है। जिनकी शादी हो चुकी है, उनकी ज़िंदगी से तुलना करते समय, केवल निबाह की मिसालों को न देखें, समझौतों की स्थितियों को भी देखें। सच तो यह है कि रिश्ते दो-तरफ़ा निबाह से ही चलते हैं। न तो कोई एक समझौते करे, तो काम चलता है और न ही दोनों का अहं उठाकर चलना कोई हल है। अगर रिश्तों की ख़लिश या शिकायतें ही पाले रहेंगे, तो निबाह और रिश्ते की मज़बूती पर असर पड़ेगा। यह सत्य है कि समाज की सारी प्रथाएं और मर्यादाएँ केवल और केवल नारी जाति के लिए ही बनाई गई हैं ! एक लंबे समय से नारी समाज के द्वारा अलग-अलग तरीकों से उत्पीड़ित की गई है। इस सब की जिम्मेदार संकीर्ण विचारधारा रही है। लेकिन किसी भी सोच को सहरानीय तब बनाया जा सकता है जब हम स्वयं संकीर्ण सोच से बाहार निकलकर जीवन की बागडोर संभालते है।

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