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प्यार में तबाही या पागलपन, फ़िल्म ‘कबीर सिंह’ की कहानी..

शाहिद कपूर की शानदार परफॉर्मेंस है,  लेकिन फिल्म आधुनिक युग के यूवा को क्या बताना चाहती है इस पर एक नजर..

सत्य संग्राम । फ़िल्म ‘कबीर सिंह’  को  प्यार की कहानी  कहना उचित नहीं  लगता है। ये एक आदमी के पागलपन की कहानी ज्यादा लगती  है। जो प्यार के नाम पर अपने आप को तबाही में धकेल देता है। इस फिल्म के किरदार कुछ इस कर ही फिल्माया गया है।  कबीर सिंह का पागलपन घिनौना है। और फ़िल्म उसी घिनौने शख़्स को हीरो बना देती है।

कमर्शियल फिल्मों की रीढ़ की हड्डी होता है प्यार। बेइंतहा प्रेम करने, प्रेम में कुर्बान हो जाने वाले प्रेमी और प्रेम में तबाह हो जाने वाले प्रेमी। प्यार के ऐसे कई स्वरूप बॉलीवुड ने हमें समय-समय पर दिखाए हैं। बॉलीवुड की तकरीब सारी प्रसिद्ध फिल्मों में यही फार्मूला भी नजर आता है।

तेलुगू फ़िल्म ‘अर्जुन रेड्डी’ पर आधारित ये फ़िल्म उस प्रेमी की कहानी है जिसकी प्रेमिका का परिवार उनके रिश्ते के ख़िलाफ़ है और प्रेमिका की शादी ज़बरदस्ती किसी और लड़के से करा देता है। कबीर सिंह फिल्म की कहानी कुछ इस तरह के है लेकिन फिल्म की कहानी कुछ अलग ही कहना चाहती है।

प्यार जैसे ख़ूबसूरत रिश्ते जिसमें हिंसा को किसी भी पैमाने से सही नहीं ठहराया जा सकता और जिसमें बराबरी और आत्म सम्मान की लड़ाई औरतें दशकों से लड़ रही हैं, उसके बारे में सोच कैसे खुलेगी?

कबीर सिंह फिल्म में दिखाया गया कि वो आदमी जिसे जब अपना प्यार नहीं मिलता तो वो किसी भी राह चलती लड़की से बिना जान पहचान शारीरिक संबंध बनाना चाहता है। इस सोच को समाज किस नजर में ढालना चाहेगी, या फिल्म का मायना सिर्फ मनोरजन करना है। यहां तक कि जब एक लड़की मना करती है तो चाक़ू की नोक पर उससे कपड़े उतारने को कहता है।

कबीर सिंह इससे पहले अपनी प्रेमिका से साढ़े चार सौ बार सेक्स कर चुका है और अब जब वो नहीं है तो अपनी गर्मी को शांत करने के लिए सरेआम अपनी पतलून में बर्फ़ डालता है। और मर्दानगी की इस नुमाइश पर सिनेमा हॉल में हंसी-ठिठोली होती है।

कबीर सिंह अपने आप को प्रेमी का रूप देकर इस दशा को अलग दिशा में करने के लिए  विलाप को जंगलीपन का रूप दे देता है। प्रेमिका हर व़क्त शलवार क़मीज़ और दुपट्टा लिए रहती है पर वो उसे गला ढकने को कहता है। क्योंकि वो किरदार शुरू से ही लड़की को अपनी जागीर मानने वाला और ‘वो मेरी नहीं तो किसी और की भी नहीं होगी’ वाली कुंठीत  मानसिकता वाला है।

कबीर सिंह अपनी प्रेमिका को यहां तक कहता है कि उसका कोई वजूद नहीं है, कॉलेज में लोग उसे सिर्फ़ इसलिए जानते हैं क्योंकि वो कबीर सिंह की प्रेमिका है। वो ये दिखाने के लिए पूरे कॉलेज को धमकाता है। होली के पर्व पर सबसे पहले वो ही उसे रंग लगाए इसके लिए बहुत सारे प्रबंध करता है। प्यार पाने की ज़िद और ना मिलने की चोट, दोनों महज़ बहाने हैं। इस किरदार की हरकतों को जायज़ ठहराने के लिए उसे हीरो बनाने का निर्णय भी समाज को दिशा से विचलित करता दिखता है।

फिल्म में कबीर सिंह का बेहिसाब ग़ुस्सा हो, बदज़बानी हो या अपनी प्रेमिका के साथ बदसलूकी, उसके दोस्त, उसका परिवार, उसके साथ काम करने वाले, उसके कॉलेज के डीन और उसकी प्रेमिका तक, सब उसे माफ़ कर देते हैं। तो दृश्क क्यों नहीं माफ़ करेंगें। क्योंकि समाज भी आज कुछ इसी तरह ढलता जा रहा है।

कबीर फ़िल्म में कुछ भी प्रगतिशील, नई सोच जैसा नहीं दिखता है कबीर फ़िल्म का अभिनेता अपनी प्रेमिका को हर हथकंडे से अपने बस में करना चाहता है और पसंद की बात ना होने पर ग़ुस्सैल स्वभाव की आड़ में जंगलीपन पर उतर आता है। खुले में शराब पीने, सिगरेट का धुंआ उड़ाने और दिल्ली जैसे ‘अनऑर्थोडोक्स’ यानी खुले विचारों वाले शहर में शादी से पहले आम तौर पर सेक्स करने का माहौल, ये सब छलावा है। असल में कबीर सिंह सभ्य समाज का दबंग है। बिना लाग-लपेट कहें, तो ये किरदार एक गुंडा है।

वर्षो से पुरूषवादी समाज औरत को नियंत्रण में रखने वाले मर्दाना किरदार को पसंद करता आया है, जो आज भी क्यों करेगा, बात कबीर सिंह की हो रही तो इसे दृश्क काफी पंसद कर रहे है फिल्म की रेंटिंग भी अच्छी रही है। ऐसी फ़िल्में करोड़ों कमाती आईं है। और सोच से परे दकियानूसी ख्यालों को जायज़ ठहराती रही है। एक औरत के दिए ग़म से निकलने के लिए एक दूसरी औरत का बलिदान इस समाज के मन को शांति देता है, इसे नई सोच कहना कभी उचित नहीं होगा। इस आधुनिक युग इस तरह की घटना से या किरदार से  प्रगतिशील समाज की संज्ञा नहीं दी जा सकती है।

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