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कुछ सपने लेकर मैं अपनों से दूर चला आया, मुझे अकेला रहना रास नहीं आ रहा…

अगर आप अपने घर परिवार से दूर रहते है तो बात आप जैसे लोगों की ही हो रही है।

सत्य संग्राम I उम्र के एक पड़ाव पर आकर जगह बदलना बड़ा कठिन हो जाता है। एक दौर होता है बचपन का जब हम नई-नई जगह जाना और वहाँ रहना बहुत पसंद करते हैं। तब हम ये चाहते है कि काश कुछ ऐसा हो जाए कि हमें घर ना लौटना पड़े, हम हमेशा ऐसे ही घूमते रहे। शायद हम ऐसा इसलिए भी सोचते है ताकि हम स्कूल जाने से और घर में बने एक अनुशासनिक माहौल से बच सके।

फिर उसके बाद एक दौर आता है जब हम शरीरिक और मानसिक रूप से तेज़ी से विकास कर रहे होते हैं, जिसे हम टीनएज का दौर भी कहते हैं। इस दौर में हम ना सिर्फ पढ़ाई बल्कि वक़्त मिलते ही नई-नई जगह को घुमने और उस जगह को जीने की जुगत में भी रहते हैं। वक़्त के साथ साथ हमारे भीतर नए-नए जगह को जानने और उसे जीने की प्रवृति भी बढ़ती जाती है। लेकिन इन सबके साथ-साथ एक और बदलाव जो हम सबके भीतर होता है वो ये की हम पूरी दुनिया को जानना, समझना और जीना तो चाहते है पर एक पर्यटक की तरह ना की उस जगह के बाशिंदे की तरह।

इस दौर के ठीक बाद एक ऐसा दौर भी आता है जब हमारे अंदर नई जगह को जानने समझने से ज्यादा खुद को किसी पसंदीदा जगह पर सैटेल करने की तड़प पैदा होने लगती है। जीवन के इस पड़ाव को अगर टीनएज का उत्तरार्ध कहे तो कुछ गलत नहीं होगा। पैरेंट्स ऐसे दौर को परिपक्वता (maturity) की निशानी मानते हैं। ऐसे दौर में जब हम स्थायित्व की तलाश में होते हैं तब कितना मुश्किल होता है उच्चतर शिक्षा या बेहतर नौकरी की तलाश में किसी घर, मुहल्ला और शहर को अपनाने के बाद उस जगह को, वहाँ के लोगों को और उनके बनाए खांचे से खुद को एक झटके में उजाड़कर अस्थायी तौर पर फिर से खुद को तथकथित रूप से स्थायीत्व देने की कोशिश करना। ऐसी परिस्थितियों में जगह बदलने से सिर्फ हमारा पता ही नहीं बदलता बल्कि पुराने शहर की आवो-हवा के साथ-साथ उस शहर के कम्फर्ट ज़ोन में ढल चुकी अपनी एक बसी-बसाई दुनिया से भी हम बाहर निकल जाते हैं।

पिछले 7 सालों से अपने घर से, अपने घरवालों से दूर रह रहा हूँ, इस दौरान भारत के 3 अलग-अलग राज्यों के अलग-अलग शहरों को क़रीब से जीने का मौका मिला। तीनों शहरों की अलग खासियत है और मेरे दिल में उनकी एक अलग जगह भी। 4 सालों के दिल्ली प्रवास के दौरान शुरुआती साढ़े तीन साल तो बस इसी जुगत में निकल गए कि कब कॉलेज खत्म हो और कब मैं अपने घर को लौटूं, पर आखिर के 6 महीनें में दिल्ली से ऐसा दिल लगा कि जो शहर कल तक मेरे लिए महज एक परदेश हुआ करता था। वो आज मेरे लिए किसी माशूका से कम नहीं है। आज भी दिल्ली को जीने और उसके साथ वक़्त बीताने का मैं कोई भी मौका नहीं छोड़ता हूँ। शायद ऐसा इसलिए भी है क्योंकि इस शहर नें मुझे लोगों के बीच उठना, बैठना, बात करना और तमाम तरह की समस्याओं के बीच जीना (Survive ) सीखाया है।

दिल्ली जैसे दौड़ते-भागते शहर के बाद वर्धा (महाराष्ट्र) के जीवन के प्रतिकूल माहौल में 2 साल गुजरना किसी तपस्या से कम नहीं है। (वर्धा/सेवाग्राम से अनजान लोगों के लिए बता दूं कि राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी नें अपनें जीवन के आखिरी 14 साल यही गुजारें थे और यही से दंगो को शांत करवाने के लिए दिल्ली जाने के बाद दिल्ली की प्रार्थना सभा में उनकी हत्या कर दी गयी थी।) वर्धा की ये धरती आज भी किसी तपोभूमि से कम नहीं है और मुझे तो ऐसा लगता है कि जिस किसी नें भी वर्धा में साल-दो साल की अपनी तपस्या सफलतापूर्वक पूरी कर ली समझों वो भारत के किसी भी कोनें में आराम से जीवन बसर कर सकता है।                                                                                           

वर्धा के बाद आगे की पढ़ाई के लिए मुझे भोपाल रुख करना पड़ा। भोपाल के बारें में एक कहावत बड़ी प्रचलित है…”गढ़ों में चित्तौरगढ़ बाकी सब गढ़ैया हैं, तालों में भोपाल ताल बाकी सब तलैया हैं।”… भोपाल शहर जितना खूबसूरत उतनी ही शांति भी है यहाँ। भारत के कई बड़े शहरों को जानने, समझने और जीने के अनुभव के बाद निःसंकोच इस बात को कह सकता हूँ कि यहाँ लोग दौड़ते-भागते नहीं बल्कि आराम से जीते हैं। जहाँ दूसरे बड़े शहरों के ऑफिसियल टाइम में लोग सड़कों पर ट्रैफिक जाम में खड़े और रेंगते दिखाई देते हैं वहीं यहाँ लोग बेफिक्री में अपने गंतव्य की ओर जाते दिखते हैं।

कुछ तथाकथित हितैषी रिश्तेदारों को लगता है की हम जैसे उच्च शिक्षा को अपना कैरियर मानने वाले तो बस मौज-मस्ती के लिए इस शहर से उस शहर का रुख करते रहते हैं। ऐसे रिश्तेदार को ससम्मान बस इतना ही कहना है कि जिस तरह आप बेहतर और 2 पैसे कम में समान खरीदने के लिए अपने छोटे से शहर में कभी गुप्ता तो कभी अग्रवाल जी की दुकान से राशन का सामान खरीदते हैं तो फिर तो हम जैसे बच्चें अपनी कैरियर की बेहतर आधारशिला के लिए इस शहर से उस शहर तक भटकटे हैं तो इसमें गलत क्या है। इसलिए कृपया अपनी ज़िंदगी को एन्जॉय करें बजाय दूसरों के फटे में टाँग अड़ाने के।

पिछले 7 सालों में कितने त्यौहार, जलसे और उत्सव के मौकें आए पर इन सारे मौकों को अपने सपनों की खातिर दरकिनार कर इस शहर से उस शहर की तरफ कूंच करता रहा, पर सच बताऊं तो मैं हर साल दो साल पर अब इस शहर से उस शहर जाना नहीं चाहता पर एक जगह रुककर सपने पूरे भी नहीं हो सकते। कुछ दिनों में भोपाल छूट जाएगा, पर अभी भी कुछ तय नहीं है कि आगे क्या, कहाँ और कैसे होगा??? ऐसे में थोड़ी बेचैनी, बेबशी और आंखों में नमी का होना स्वाभाविक भी है। वक़्त भाग रहा है, पर मैं रुककर इस पल को थोड़ा और जीना चाहता हूँ। लेकिन एक सच्चाई तो ये भी है कि चलते रहना हमारे ज़िंदा होने की निशानी है और ज़िंदा रहना हमारे चलते रहने की।

Mausam Jaiswal

research scholar, mcu bhopal

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